Standing Order (स्टैंडिंग ऑर्डर) in Labour Law और Act 1946

स्टैंडिंग ऑर्डर

भारत में औद्योगिक संबंधों (Industrial Relations) को संतुलित और सुव्यवस्थित बनाए रखने के लिए विभिन्न श्रम कानून बनाए गए हैं। इन कानूनों का उद्देश्य है – नियोक्ता (Employer) और श्रमिक (Worker) दोनों के बीच पारदर्शिता, निष्पक्षता और अनुशासन कायम रखना। इन्हीं कानूनों में एक महत्वपूर्ण प्रावधान है स्टैंडिंग ऑर्डर (Standing Order)

स्टैंडिंग ऑर्डर कार्यस्थल पर कर्मचारियों के लिए नियम और आचार संहिता (Code of Conduct) तय करता है। इसे औद्योगिक संस्थानों के लिए एक तरह का “संविधान” भी कहा जा सकता है।

Table of Contents

Standing Order in Labour Law क्या है?

Standing Order (स्टैंडिंग ऑर्डर) ऐसे लिखित नियम एवं शर्तें (Written Terms and Conditions of Employment) होते हैं जो किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान (Industrial Establishment) में कर्मचारियों की सेवा से संबंधित नियमों को स्पष्ट रूप से निर्धारित करते हैं। इन नियमों में कर्मचारियों की नियुक्ति, कार्य समय, अवकाश, अनुशासन, छुट्टियां, स्थानांतरण, पदोन्नति, दंड, सेवा समाप्ति आदि से संबंधित प्रावधान शामिल होते हैं।

सरल शब्दों में, Standing Order किसी कंपनी का आधिकारिक सेवा नियम (Service Rule Book) होता है, जिसके आधार पर नियोक्ता (Employer) और कर्मचारी (Employee) दोनों कार्य करते हैं।

Standing Order का अर्थ (Meaning of Standing Order)

“Standing” का अर्थ है स्थायी (Permanent) और “Order” का अर्थ है नियम (Rules)

अर्थात,

Standing Order = कर्मचारियों के लिए स्थायी सेवा नियम।

इनका उद्देश्य कार्यस्थल पर स्पष्टता, अनुशासन, समानता और पारदर्शिता बनाए रखना है।

Standing Order का इतिहास

भारत में औद्योगिक विकास के शुरुआती वर्षों में प्रत्येक उद्योग अपने अनुसार नियम बनाता था। परिणामस्वरूप कर्मचारियों के साथ भेदभाव, अनुचित बर्खास्तगी और श्रम विवाद बढ़ने लगे।

इसी समस्या को दूर करने के लिए सरकार ने Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 लागू किया।

बाद में Industrial Relations Code, 2020 लागू होने के बाद Standing Orders से संबंधित प्रावधान इसी कोड में समाहित कर दिए गए।

Standing Order का महत्व

  1. औद्योगिक शांति

स्पष्ट नियम विवाद कम करते हैं।

  1. पारदर्शिता

हर कर्मचारी अपने अधिकार जानता है।

  1. समानता

सभी कर्मचारियों पर समान नियम लागू होते हैं।

  1. कानूनी सुरक्षा

नियोक्ता और कर्मचारी दोनों को सुरक्षा मिलती है।

  1. उत्पादकता

अनुशासन के कारण कार्यक्षमता बढ़ती है।

Standing Order का उद्देश्य

Standing Orders का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों एवं नियोक्ताओं के बीच स्पष्ट एवं निष्पक्ष कार्य संबंध स्थापित करना है।

इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—

  • कर्मचारियों के अधिकार स्पष्ट करना
  • नियोक्ता के अधिकार निर्धारित करना
  • कार्यस्थल पर अनुशासन बनाए रखना
  • श्रम विवाद कम करना
  • समान नियम लागू करना
  • मनमानी कार्रवाई रोकना
  • सेवा शर्तों को लिखित रूप देना
  • पारदर्शिता बढ़ाना
  • औद्योगिक शांति बनाए रखना

कानूनी आधार

Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 के तहत प्रत्येक औद्योगिक प्रतिष्ठान में स्टैंडिंग ऑर्डर बनाना आवश्यक है।

  • यह कानून 1946 में पारित हुआ और 23 अप्रैल 1946 से लागू हुआ।

  • इसका उद्देश्य श्रमिकों और नियोक्ताओं के बीच विवाद को कम करना और पारदर्शी व्यवस्था स्थापित करना है।

Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 का विस्तृत विवरण

भारत में औद्योगिक संस्थानों (Industrial Establishments) में नियोक्ता और कर्मचारी के बीच अक्सर नौकरी की शर्तों, अनुशासन, छुट्टियों और अन्य विषयों को लेकर विवाद पैदा हो जाते थे। इस समस्या को दूर करने और एक पारदर्शी प्रणाली लाने के लिए Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 लागू किया गया।

Retrenchment in Labour Law 2025 (लेबर लॉ में रिट्रेंचमेंट)

इस कानून का उद्देश्य

इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य था –

  • औद्योगिक प्रतिष्ठानों में कर्मचारियों की सेवा शर्तों (Service Conditions) को लिखित रूप में स्पष्ट करना।

  • नियोक्ता की मनमानी और मौखिक आदेशों से बचाव करना।

  • कर्मचारियों और नियोक्ता के बीच अनुशासन और सामंजस्य बनाए रखना।

अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ

  1. लागू क्षेत्र (Applicability):

    • यह कानून उन औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर लागू होता है जहाँ 100 या उससे अधिक कर्मचारी कार्यरत हों।

    • राज्य सरकार चाहे तो इसे 50 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले संस्थानों पर भी लागू कर सकती है।

  2. स्टैंडिंग ऑर्डर की परिभाषा:

    • स्टैंडिंग ऑर्डर का मतलब है – कर्मचारियों की भर्ती, कार्य समय, छुट्टियाँ, अनुशासन, दंड और सेवा समाप्ति संबंधी नियमों का लिखित प्रारूप।

  3. मसौदा तैयार करना (Drafting):

    • नियोक्ता को अपने संस्थान के लिए स्टैंडिंग ऑर्डर का मसौदा (Draft) तैयार करना होता है।

    • यह मसौदा कर्मचारियों के लिए स्पष्ट और न्यायसंगत होना चाहिए।

  4. प्रमाणन (Certification):

    • तैयार मसौदे को “Certifying Officer” (आमतौर पर श्रम आयुक्त) के पास प्रस्तुत करना होता है।

    • अधिकारी कर्मचारियों और उनके यूनियन को नोटिस देकर उनकी आपत्तियाँ सुनता है।

    • इसके बाद आवश्यक संशोधन कर स्टैंडिंग ऑर्डर को प्रमाणित करता है।

  5. अवधि (Period of Operation):

    • एक बार प्रमाणित होने के बाद स्टैंडिंग ऑर्डर अनिवार्य हो जाते हैं।

    • सामान्यतः यह 6 महीने तक लागू रहते हैं और बाद में संशोधित भी किए जा सकते हैं।

  6. अनुशासन और दंड:

    • इसमें कर्मचारियों की आचार संहिता (Code of Conduct) और अनुशासन भंग की स्थिति में दंड का उल्लेख होता है।

सीमाएँ

  • यह कानून केवल बड़े उद्योगों (100+ कर्मचारियों) पर लागू होता है।

  • छोटे उद्योगों और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को इसका लाभ नहीं मिल पाता।

  • प्रमाणन और संशोधन की प्रक्रिया कभी-कभी लंबी और जटिल हो जाती है।

Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा और औद्योगिक अनुशासन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सुनिश्चित करता है कि कर्मचारी और नियोक्ता दोनों ही स्पष्ट नियमों और लिखित शर्तों के आधार पर कार्य करें।

आज की बदलती आर्थिक और तकनीकी परिस्थितियों में इस अधिनियम को और अधिक लचीला और व्यापक बनाने की आवश्यकता है ताकि असंगठित क्षेत्र और छोटे उद्योगों के श्रमिक भी इससे लाभान्वित हो सकें।

Industrial Relations Code, 2020 के अंतर्गत Standing Orders

Industrial Relations Code, 2020 के अनुसार सरकार मॉडल स्टैंडिंग ऑर्डर (Model Standing Orders) जारी कर सकती है। जिन प्रतिष्ठानों पर यह प्रावधान लागू होता है, उन्हें अपने Standing Orders तैयार कर प्रमाणित (Certified) कराना होता है। यदि किसी प्रतिष्ठान ने अपने प्रमाणित Standing Orders लागू नहीं किए हैं, तो परिस्थितियों के अनुसार मॉडल स्टैंडिंग ऑर्डर लागू हो सकते हैं। समय-समय पर केंद्र या राज्य सरकार द्वारा अधिसूचनाओं के माध्यम से लागू होने की सीमा और अन्य विवरण निर्धारित किए जाते हैं।

Standing Order किन प्रतिष्ठानों पर लागू होता है?

सामान्य रूप से यह प्रावधान उन औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर लागू होता है जहां सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम संख्या में कर्मचारी कार्यरत हों। वर्तमान व्यवस्था में लागू सीमा संबंधित कानून एवं अधिसूचनाओं के अनुसार निर्धारित होती है।

स्टैंडिंग ऑर्डर की आवश्यकता क्यों?

औद्योगिक संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों के बीच अक्सर विवाद उत्पन्न होते हैं।
उदाहरण:

  • कार्य समय (Working Hours) को लेकर

  • छुट्टियों (Leave) को लेकर

  • अनुशासन और दंड (Discipline & Punishment) को लेकर

ऐसी स्थिति में यदि पहले से स्पष्ट नियम न हों तो विवाद बढ़ जाते हैं। स्टैंडिंग ऑर्डर इन समस्याओं को रोकने के लिए बनाए जाते हैं।

लेबर लॉ बेयर एक्ट (Labour Law Bare Act): 2025 पूरी जानकारी

स्टैंडिंग ऑर्डर की मुख्य विशेषताएँ

  1. लिखित नियम (Written Rules):
    यह मौखिक न होकर लिखित रूप में होते हैं।

  2. निष्पक्षता (Fairness):
    नियम कर्मचारी और नियोक्ता दोनों के लिए समान रूप से लागू होते हैं।

  3. अनिवार्यता (Compulsory):
    100 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले औद्योगिक प्रतिष्ठानों में स्टैंडिंग ऑर्डर बनाना अनिवार्य है।

  4. अनुमोदन (Certification):
    स्टैंडिंग ऑर्डर को श्रम आयुक्त (Labour Commissioner) या “Certifying Officer” से प्रमाणित कराना आवश्यक है।

  5. स्पष्टता (Clarity):
    इसमें कर्मचारियों की भर्ती, कार्य समय, छुट्टी, अनुशासन, दंड आदि का स्पष्ट उल्लेख होता है।

स्टैंडिंग ऑर्डर में क्या-क्या शामिल होता है?

एक प्रभावी Standing Order में सामान्यतः निम्नलिखित विषय शामिल होते हैं—

  1. कर्मचारियों का वर्गीकरण
  • स्थायी कर्मचारी
  • अस्थायी कर्मचारी
  • प्रशिक्षु
  • प्रोबेशनर
  • कैजुअल कर्मचारी
  • बदली कर्मचारी
  • संविदा कर्मचारी (जहां लागू हो)
  1. कार्य समय
  • कार्यालय समय
  • शिफ्ट
  • विश्राम अवधि
  • ओवरटाइम
  • साप्ताहिक अवकाश
  1. उपस्थिति नियम
  • समय पर उपस्थित होना
  • बायोमेट्रिक नियम
  • अनुपस्थिति की सूचना
  • देरी से आने के नियम
  1. अवकाश
  • अर्जित अवकाश
  • आकस्मिक अवकाश
  • चिकित्सा अवकाश
  • मातृत्व अवकाश
  • पितृत्व अवकाश (जहां लागू हो)
  • राष्ट्रीय अवकाश
  1. वेतन
  • वेतन भुगतान
  • ओवरटाइम भुगतान
  • बोनस
  • भत्ते
  • कटौतियां
  1. अनुशासन
  • कर्मचारियों का आचरण
  • अनुशासन बनाए रखना
  • कार्यस्थल का व्यवहार
  • सुरक्षा नियम
  1. दुराचार (Misconduct)

जैसे—

  • चोरी
  • धोखाधड़ी
  • मारपीट
  • आदेश न मानना
  • हिंसा
  • कंपनी की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना
  • शराब या नशे की हालत में कार्य करना
  • गोपनीय जानकारी का दुरुपयोग
  1. अनुशासनात्मक कार्रवाई
  • चेतावनी
  • लिखित चेतावनी
  • निलंबन
  • वेतन कटौती (जहां कानूनन अनुमत हो)
  • पदावनति
  • सेवा समाप्ति
  1. शिकायत निवारण
  • शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया
  • जांच समिति
  • अपील प्रक्रिया
  1. सेवा समाप्ति
  • इस्तीफा
  • नोटिस अवधि
  • रिटायरमेंट
  • बर्खास्तगी
  • छंटनी (Retrenchment)
  • सेवानिवृत्ति

Standing Orders Certification (प्रमाणन प्रक्रिया)

Procedure for making and certifying standing orders

Standing Orders तभी प्रभावी माने जाते हैं जब निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उनका प्रमाणन किया जाए।

चरण 1: ड्राफ्ट तैयार करना

नियोक्ता अपने Standing Orders तैयार करता है।

चरण 2: जमा करना

ड्राफ्ट संबंधित प्रमाणन अधिकारी (Certifying Officer) के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।

चरण 3: कर्मचारियों को सूचना

कर्मचारियों या उनके प्रतिनिधियों को आपत्ति दर्ज करने का अवसर दिया जाता है।

चरण 4: सुनवाई

दोनों पक्षों की बात सुनी जाती है।

चरण 5: प्रमाणन

यदि नियम कानून के अनुरूप हों तो अधिकारी उन्हें प्रमाणित कर देता है।

चरण 6: लागू होना

प्रमाणित Standing Orders निर्धारित तिथि से प्रभावी हो जाते हैं।

Standing Orders में संशोधन (Modification)

यदि समय के साथ नियम बदलने की आवश्यकता हो तो—

  • नियोक्ता संशोधन का प्रस्ताव दे सकता है।
  • कर्मचारी भी संशोधन की मांग कर सकते हैं।
  • निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक होता है।
  • संशोधन का भी प्रमाणन कराया जाता है।

Model Standing Orders क्या होते हैं?

Model Standing Orders सरकार द्वारा बनाए गए मानक नियम होते हैं।

इनका उद्देश्य है—

  • सभी उद्योगों में न्यूनतम समानता लाना।
  • कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करना।
  • छोटे उद्योगों को तैयार नियम उपलब्ध कराना।
  • विवाद कम करना।

स्टैंडिंग ऑर्डर और अपील

  • यदि किसी पक्ष को Certifying Officer के निर्णय से असहमति हो तो वे अपील प्राधिकरण (Appellate Authority) के पास अपील कर सकते हैं।

  • अपील का निपटारा आमतौर पर 3 महीने में किया जाता है।

स्टैंडिंग ऑर्डर के लाभ

(A) नियोक्ता के लिए

  • अधिकार स्पष्ट होते हैं।
  • नौकरी की सुरक्षा बढ़ती है।
  • अनुचित कार्रवाई कम होती है।
  • निष्पक्ष व्यवहार मिलता है।
  • विवाद होने पर लिखित नियम उपलब्ध रहते हैं।

(B) कर्मचारियों के लिए

  • अनुशासन बनाए रखना आसान होता है।
  • कानूनी विवाद कम होते हैं।
  • निर्णय लेने में स्पष्टता रहती है।
  • मानव संसाधन प्रबंधन बेहतर होता है।
  • कर्मचारियों का विश्वास बढ़ता है।

Standing Order में शामिल सामान्य विषय

विषयविवरण
कर्मचारी वर्गीकरणस्थायी, अस्थायी, प्रशिक्षु आदि
कार्य समयशिफ्ट, समय, विश्राम
अवकाशविभिन्न प्रकार की छुट्टियां
वेतनभुगतान, भत्ते, कटौती
अनुशासनआचरण संबंधी नियम
दुराचारMisconduct की सूची
दंडचेतावनी, निलंबन, बर्खास्तगी
शिकायतशिकायत निवारण प्रक्रिया
स्थानांतरणट्रांसफर नियम
सेवा समाप्तिइस्तीफा, नोटिस, रिटायरमेंट

उदाहरण

मान लीजिए किसी कंपनी में 500 कर्मचारी कार्य करते हैं।

यदि कोई कर्मचारी लगातार 10 दिन बिना सूचना अनुपस्थित रहता है, तो Standing Order में पहले से निर्धारित नियम के अनुसार—

  • कारण पूछा जाएगा।
  • जांच की जाएगी।
  • कर्मचारी को जवाब देने का अवसर दिया जाएगा।
  • उसके बाद नियमानुसार कार्रवाई होगी।

यदि Standing Order न हो तो नियोक्ता और कर्मचारी दोनों के बीच विवाद उत्पन्न हो सकता है।

Standing Order और Service Rules में अंतर

आधारStanding OrderService Rules
कानूनी आधारकानून द्वारा मान्यता प्राप्तसंगठन की आंतरिक नीति
प्रमाणनआवश्यक (जहां कानून लागू हो)सामान्यतः आवश्यक नहीं
लागू क्षेत्रऔद्योगिक प्रतिष्ठानसरकारी एवं निजी संस्थान
संशोधननिर्धारित प्रक्रिया सेसंस्था के नियमों के अनुसार
कानूनी प्रभावअधिक मजबूतसीमित

Standing Order और HR Policy में अंतर

आधारStanding OrderHR Policy
प्रकृतिकानूनी दस्तावेजप्रशासनिक दस्तावेज
उद्देश्यसेवा शर्तें निर्धारित करनाHR प्रक्रियाओं का संचालन
बाध्यताकानूनीसंस्थागत
प्रमाणनआवश्यक हो सकता हैआवश्यक नहीं
विवाद में उपयोगन्यायालय में महत्वपूर्णसहायक दस्तावेज

भारत बनाम विकसित देशों में स्टैंडिंग ऑर्डर की तुलना

पहलूभारतविकसित देश (जैसे – अमेरिका, यूके)
कानूनी आधारIndustrial Employment (Standing Orders) Act, 1946Employment Contracts & Collective Agreements
दायरा100+ कर्मचारियों वाले संस्थान में अनिवार्यEmployment Policy के आधार पर संस्थान स्वयं तय करते हैं
स्वरूपलिखित और प्रमाणित (Certified)अक्सर “Company Handbook” या “Employee Agreement”
विवाद निवारणCertifying Officer और Appellate AuthorityLabour Courts / Employment Tribunals

Standing Order और Labour Law का संबंध

Standing Orders श्रम कानूनों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं क्योंकि—

  • ये कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करते हैं।
  • रोजगार संबंधी नियमों को स्पष्ट बनाते हैं।
  • औद्योगिक विवाद कम करते हैं।
  • प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों को मजबूत करते हैं।
  • अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए प्रक्रिया प्रदान करते हैं।

Standing Orders लागू करते समय सर्वोत्तम अभ्यास (Best Practices)

  • नियम स्पष्ट, सरल और सभी कर्मचारियों के लिए सुलभ हों।
  • नियुक्ति के समय कर्मचारियों को उनकी प्रति या डिजिटल एक्सेस उपलब्ध कराया जाए।
  • स्थानीय भाषा और आवश्यकता होने पर अंग्रेज़ी में भी उपलब्ध कराए जाएं।
  • समय-समय पर समीक्षा कर कानूनी बदलावों के अनुरूप संशोधित किए जाएं।
  • HR और प्रबंधकों को नियमों के उचित अनुपालन का प्रशिक्षण दिया जाए।
  • अनुशासनात्मक कार्रवाई से पहले निष्पक्ष जांच और कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए।

निष्कर्ष

Standing Order किसी भी औद्योगिक प्रतिष्ठान की सेवा शर्तों का आधारभूत कानूनी दस्तावेज है। यह नियोक्ता और कर्मचारी दोनों के अधिकारों एवं दायित्वों को स्पष्ट करता है, अनुशासन बनाए रखने में मदद करता है और औद्योगिक विवादों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। Industrial Relations Code, 2020 के लागू होने के बाद भी Standing Orders का महत्व बना हुआ है, क्योंकि ये कार्यस्थल पर पारदर्शिता, निष्पक्षता और औद्योगिक शांति सुनिश्चित करने के प्रमुख साधनों में से एक हैं। यदि किसी संगठन के Standing Orders स्पष्ट, अद्यतन और विधि-सम्मत हैं, तो वह बेहतर मानव संसाधन प्रबंधन और स्वस्थ औद्योगिक संबंध स्थापित करने में अधिक सक्षम होता है।

Labour Laws in India: India’s 4 Labour Codes (श्रम कानून)

Standing Orders in Labour Law – FAQs

Standing Orders क्या होते हैं?

Standing Orders वे लिखित नियम होते हैं जो किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान में कर्मचारियों की सेवा शर्तों को निर्धारित करते हैं।

इनका उद्देश्य कर्मचारियों और नियोक्ताओं के बीच सेवा शर्तों में स्पष्टता और पारदर्शिता लाना है।

भारत में Standing Orders का प्रावधान Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 के अंतर्गत है।

यह कानून सामान्यतः उन औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर लागू होता है जहाँ निर्धारित न्यूनतम संख्या में कर्मचारी कार्यरत हों।

कार्य समय, अवकाश, अनुशासन, नियुक्ति, सेवा समाप्ति और आचरण से संबंधित नियम इसमें शामिल होते हैं।

वे Standing Orders जिन्हें सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत (प्रमाणित) कर दिया गया हो, Certified Standing Orders कहलाते हैं।

इनका पालन न करने पर नियोक्ता पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

Standing Orders कानून द्वारा अनिवार्य होते हैं, जबकि Service Rules आंतरिक नीतियाँ होती हैं।

हाँ, निर्धारित प्रक्रिया का पालन करके Standing Orders में संशोधन किया जा सकता है।

यह कर्मचारियों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों की स्पष्ट जानकारी देता है।

हाँ, यह Labour Law, HRM, B.Com, LLB जैसी परीक्षाओं में महत्वपूर्ण टॉपिक है।

स्पष्ट Standing Orders होने से औद्योगिक विवादों की संभावना कम हो जाती है।

सरकार द्वारा जारी मानक नियमों का प्रारूप, जिसे आधार बनाकर संस्थान अपने Standing Orders तैयार कर सकते हैं।

हाँ। कर्मचारियों को लागू सेवा नियमों की जानकारी उपलब्ध कराना एक अच्छी और पारदर्शी प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है।

Share This Post On
Scroll to Top