Standing Order (स्टैंडिंग ऑर्डर) in Labour Law और Act 1946

स्टैंडिंग ऑर्डर

भारत में औद्योगिक संबंधों (Industrial Relations) को संतुलित और सुव्यवस्थित बनाए रखने के लिए विभिन्न श्रम कानून बनाए गए हैं। इन कानूनों का उद्देश्य है – नियोक्ता (Employer) और श्रमिक (Worker) दोनों के बीच पारदर्शिता, निष्पक्षता और अनुशासन कायम रखना। इन्हीं कानूनों में एक महत्वपूर्ण प्रावधान है स्टैंडिंग ऑर्डर (Standing Order)

स्टैंडिंग ऑर्डर कार्यस्थल पर कर्मचारियों के लिए नियम और आचार संहिता (Code of Conduct) तय करता है। इसे औद्योगिक संस्थानों के लिए एक तरह का “संविधान” भी कहा जा सकता है।

स्टैंडिंग ऑर्डर का मतलब है –

“किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान (Industrial Establishment) में श्रमिकों की भर्ती, सेवा की शर्तें, आचार संहिता, अनुशासन और अन्य कार्य परिस्थितियों के बारे में लिखित रूप में तैयार किए गए नियम।”

यह नियोक्ता और कर्मचारी दोनों के लिए अनिवार्य दिशा-निर्देश (Mandatory Guidelines) का काम करते हैं।

कानूनी आधार

Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 के तहत प्रत्येक औद्योगिक प्रतिष्ठान में स्टैंडिंग ऑर्डर बनाना आवश्यक है।

  • यह कानून 1946 में पारित हुआ और 23 अप्रैल 1946 से लागू हुआ।

  • इसका उद्देश्य श्रमिकों और नियोक्ताओं के बीच विवाद को कम करना और पारदर्शी व्यवस्था स्थापित करना है।

Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 का विस्तृत विवरण

भारत में औद्योगिक संस्थानों (Industrial Establishments) में नियोक्ता और कर्मचारी के बीच अक्सर नौकरी की शर्तों, अनुशासन, छुट्टियों और अन्य विषयों को लेकर विवाद पैदा हो जाते थे। इस समस्या को दूर करने और एक पारदर्शी प्रणाली लाने के लिए Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 लागू किया गया।

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इस कानून का उद्देश्य

इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य था –

  • औद्योगिक प्रतिष्ठानों में कर्मचारियों की सेवा शर्तों (Service Conditions) को लिखित रूप में स्पष्ट करना।

  • नियोक्ता की मनमानी और मौखिक आदेशों से बचाव करना।

  • कर्मचारियों और नियोक्ता के बीच अनुशासन और सामंजस्य बनाए रखना।

अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ

  1. लागू क्षेत्र (Applicability):

    • यह कानून उन औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर लागू होता है जहाँ 100 या उससे अधिक कर्मचारी कार्यरत हों।

    • राज्य सरकार चाहे तो इसे 50 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले संस्थानों पर भी लागू कर सकती है।

  2. स्टैंडिंग ऑर्डर की परिभाषा:

    • स्टैंडिंग ऑर्डर का मतलब है – कर्मचारियों की भर्ती, कार्य समय, छुट्टियाँ, अनुशासन, दंड और सेवा समाप्ति संबंधी नियमों का लिखित प्रारूप।

  3. मसौदा तैयार करना (Drafting):

    • नियोक्ता को अपने संस्थान के लिए स्टैंडिंग ऑर्डर का मसौदा (Draft) तैयार करना होता है।

    • यह मसौदा कर्मचारियों के लिए स्पष्ट और न्यायसंगत होना चाहिए।

  4. प्रमाणन (Certification):

    • तैयार मसौदे को “Certifying Officer” (आमतौर पर श्रम आयुक्त) के पास प्रस्तुत करना होता है।

    • अधिकारी कर्मचारियों और उनके यूनियन को नोटिस देकर उनकी आपत्तियाँ सुनता है।

    • इसके बाद आवश्यक संशोधन कर स्टैंडिंग ऑर्डर को प्रमाणित करता है।

  5. अवधि (Period of Operation):

    • एक बार प्रमाणित होने के बाद स्टैंडिंग ऑर्डर अनिवार्य हो जाते हैं।

    • सामान्यतः यह 6 महीने तक लागू रहते हैं और बाद में संशोधित भी किए जा सकते हैं।

  6. अनुशासन और दंड:

    • इसमें कर्मचारियों की आचार संहिता (Code of Conduct) और अनुशासन भंग की स्थिति में दंड का उल्लेख होता है।

सीमाएँ

  • यह कानून केवल बड़े उद्योगों (100+ कर्मचारियों) पर लागू होता है।

  • छोटे उद्योगों और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को इसका लाभ नहीं मिल पाता।

  • प्रमाणन और संशोधन की प्रक्रिया कभी-कभी लंबी और जटिल हो जाती है।

Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा और औद्योगिक अनुशासन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सुनिश्चित करता है कि कर्मचारी और नियोक्ता दोनों ही स्पष्ट नियमों और लिखित शर्तों के आधार पर कार्य करें।

आज की बदलती आर्थिक और तकनीकी परिस्थितियों में इस अधिनियम को और अधिक लचीला और व्यापक बनाने की आवश्यकता है ताकि असंगठित क्षेत्र और छोटे उद्योगों के श्रमिक भी इससे लाभान्वित हो सकें।

स्टैंडिंग ऑर्डर की आवश्यकता क्यों?

औद्योगिक संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों के बीच अक्सर विवाद उत्पन्न होते हैं।
उदाहरण:

  • कार्य समय (Working Hours) को लेकर

  • छुट्टियों (Leave) को लेकर

  • अनुशासन और दंड (Discipline & Punishment) को लेकर

ऐसी स्थिति में यदि पहले से स्पष्ट नियम न हों तो विवाद बढ़ जाते हैं। स्टैंडिंग ऑर्डर इन समस्याओं को रोकने के लिए बनाए जाते हैं।

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स्टैंडिंग ऑर्डर की मुख्य विशेषताएँ

  1. लिखित नियम (Written Rules):
    यह मौखिक न होकर लिखित रूप में होते हैं।

  2. निष्पक्षता (Fairness):
    नियम कर्मचारी और नियोक्ता दोनों के लिए समान रूप से लागू होते हैं।

  3. अनिवार्यता (Compulsory):
    100 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले औद्योगिक प्रतिष्ठानों में स्टैंडिंग ऑर्डर बनाना अनिवार्य है।

  4. अनुमोदन (Certification):
    स्टैंडिंग ऑर्डर को श्रम आयुक्त (Labour Commissioner) या “Certifying Officer” से प्रमाणित कराना आवश्यक है।

  5. स्पष्टता (Clarity):
    इसमें कर्मचारियों की भर्ती, कार्य समय, छुट्टी, अनुशासन, दंड आदि का स्पष्ट उल्लेख होता है।

स्टैंडिंग ऑर्डर में क्या-क्या शामिल होता है?

Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 की अनुसूची (Schedule) के अनुसार इनमें निम्नलिखित बातें शामिल होनी चाहिए:

  1. कार्य का समय और शिफ्ट (Hours of Work, Shifts)

  2. छुट्टियाँ और अवकाश (Leave and Holidays)

  3. श्रमिकों का वर्गीकरण (Classification of Workers – Permanent, Temporary, Probationer, Apprentice)

  4. भर्ती और नौकरी समाप्त करने की प्रक्रिया (Termination and Dismissal)

  5. अनुशासन और दंड की व्यवस्था (Discipline & Punishment)

  6. हड़ताल और तालाबंदी (Strikes & Lockouts) की स्थिति

  7. शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Redressal)

स्टैंडिंग ऑर्डर बनाने और प्रमाणित करने की प्रक्रिया

Procedure for making and certifying standing orders
  1. मसौदा तैयार करना (Drafting):
    नियोक्ता द्वारा स्टैंडिंग ऑर्डर का मसौदा तैयार किया जाता है।

  2. प्रस्तुति (Submission):
    मसौदा “Certifying Officer” के पास जमा किया जाता है।

  3. नोटिस (Notice):
    कर्मचारियों या उनके यूनियन को नोटिस जारी किया जाता है ताकि वे अपनी आपत्तियाँ दर्ज कर सकें।

  4. सुनवाई (Hearing):
    Certifying Officer नियोक्ता और कर्मचारियों दोनों की बातें सुनता है।

  5. प्रमाणन (Certification):
    आवश्यक संशोधन करने के बाद स्टैंडिंग ऑर्डर को प्रमाणित किया जाता है।

स्टैंडिंग ऑर्डर और अपील

  • यदि किसी पक्ष को Certifying Officer के निर्णय से असहमति हो तो वे अपील प्राधिकरण (Appellate Authority) के पास अपील कर सकते हैं।

  • अपील का निपटारा आमतौर पर 3 महीने में किया जाता है।

स्टैंडिंग ऑर्डर के लाभ

(A) नियोक्ता के लिए

  • कार्यस्थल पर अनुशासन बनाए रखना

  • विवाद और हड़ताल की संभावना कम करना

  • कर्मचारियों के कार्य प्रदर्शन में सुधार

(B) कर्मचारियों के लिए

  • नौकरी की शर्तों में पारदर्शिता

  • मनमानी और शोषण से सुरक्षा

  • शिकायत निवारण की सुविधा

भारत बनाम विकसित देशों में स्टैंडिंग ऑर्डर की तुलना

पहलूभारतविकसित देश (जैसे – अमेरिका, यूके)
कानूनी आधारIndustrial Employment (Standing Orders) Act, 1946Employment Contracts & Collective Agreements
दायरा100+ कर्मचारियों वाले संस्थान में अनिवार्यEmployment Policy के आधार पर संस्थान स्वयं तय करते हैं
स्वरूपलिखित और प्रमाणित (Certified)अक्सर “Company Handbook” या “Employee Agreement”
विवाद निवारणCertifying Officer और Appellate AuthorityLabour Courts / Employment Tribunals

निष्कर्ष

स्टैंडिंग ऑर्डर औद्योगिक संस्थानों के लिए अत्यंत आवश्यक हैं क्योंकि यह कर्मचारियों और नियोक्ताओं दोनों को स्पष्ट दिशा-निर्देश देते हैं। यह न केवल कार्यस्थल पर अनुशासन बनाए रखने में सहायक हैं बल्कि औद्योगिक शांति और सौहार्द को भी सुनिश्चित करते हैं।

आज के समय में जब तकनीक और रोजगार की प्रकृति तेजी से बदल रही है, तब स्टैंडिंग ऑर्डर को अधिक लचीला और आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप बनाना आवश्यक है। इससे श्रमिकों की सुरक्षा और उद्योगों की उत्पादकता – दोनों में वृद्धि होगी।

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Standing Orders in Labour Law – FAQs

Standing Orders क्या होते हैं?

Standing Orders वे लिखित नियम होते हैं जो किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान में कर्मचारियों की सेवा शर्तों को निर्धारित करते हैं।

इनका उद्देश्य कर्मचारियों और नियोक्ताओं के बीच सेवा शर्तों में स्पष्टता और पारदर्शिता लाना है।

भारत में Standing Orders का प्रावधान Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 के अंतर्गत है।

यह कानून सामान्यतः उन औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर लागू होता है जहाँ निर्धारित न्यूनतम संख्या में कर्मचारी कार्यरत हों।

कार्य समय, अवकाश, अनुशासन, नियुक्ति, सेवा समाप्ति और आचरण से संबंधित नियम इसमें शामिल होते हैं।

वे Standing Orders जिन्हें सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत (प्रमाणित) कर दिया गया हो, Certified Standing Orders कहलाते हैं।

इनका पालन न करने पर नियोक्ता पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

Standing Orders कानून द्वारा अनिवार्य होते हैं, जबकि Service Rules आंतरिक नीतियाँ होती हैं।

हाँ, निर्धारित प्रक्रिया का पालन करके Standing Orders में संशोधन किया जा सकता है।

यह कर्मचारियों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों की स्पष्ट जानकारी देता है।

हाँ, यह Labour Law, HRM, B.Com, LLB जैसी परीक्षाओं में महत्वपूर्ण टॉपिक है।

स्पष्ट Standing Orders होने से औद्योगिक विवादों की संभावना कम हो जाती है।

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