LLP Act, 2008: Limited Liability Partnership Act हिन्‍दी में

llp act 2008

भारत में व्यवसाय करने के कई कानूनी स्वरूप उपलब्ध हैं – जैसे एकल स्वामित्व (Sole Proprietorship), साझेदारी फर्म (Partnership Firm), निजी लिमिटेड कंपनी (Private Limited Company) और सार्वजनिक लिमिटेड कंपनी (Public Limited Company)। लेकिन समय के साथ यह अनुभव हुआ कि पारंपरिक साझेदारी फर्म और कंपनी स्वरूप के बीच एक ऐसा मॉडल होना चाहिए जो साझेदारी की सरलता और कंपनी की सीमित दायित्व की सुविधा दोनों प्रदान कर सके। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने सीमित दायित्व साझेदारी अधिनियम (LLP Act), 2008 को लागू किया।

LLP Act भारत में सीमित दायित्व साझेदारी (LLP) को मान्यता और कानूनी ढांचा प्रदान करता है।

Table of Contents

सीमित दायित्व साझेदारी (LLP) क्या है?

LLP एक ऐसा व्यवसायिक स्वरूप है जिसमें –

  • यह साझेदारी (Partnership) की तरह लचीला होता है,

  • लेकिन कंपनी (Company) की तरह सीमित दायित्व का लाभ देता है।

LLP में प्रत्येक साझेदार की जिम्मेदारी केवल उसकी पूंजी योगदान (Capital Contribution) तक सीमित होती है। यदि LLP को नुकसान होता है या उस पर कोई ऋण बकाया होता है, तो साझेदारों की व्यक्तिगत संपत्ति उससे प्रभावित नहीं होती।

LLP Act, 2008 की मुख्य विशेषताएँ

  1. कानूनी इकाई का दर्जा (Separate Legal Entity)

    • LLP को कंपनी की तरह एक स्वतंत्र कानूनी इकाई माना जाता है।

    • यह अपने नाम से संपत्ति खरीद सकता है, मुकदमा दायर कर सकता है या मुकदमा झेल सकता है।

  2. सीमित दायित्व (Limited Liability)

    • साझेदार केवल अपने निवेश तक ही जिम्मेदार होते हैं।

    • व्यक्तिगत संपत्ति सुरक्षित रहती है।

  3. साझेदारी का लचीलापन (Flexibility of Partnership)

    • LLP समझौते के अनुसार साझेदार अपने अधिकार और कर्तव्यों को स्वतंत्र रूप से तय कर सकते हैं।

    • प्रबंधन में ज्यादा नियमबद्धता नहीं है, जिससे संचालन सरल होता है।

  4. न्यूनतम साझेदार (Minimum Partners)

    • LLP शुरू करने के लिए न्यूनतम दो साझेदार जरूरी हैं।

    • अधिकतम साझेदारों की कोई सीमा नहीं है।

  5. अनिवार्य पंजीकरण (Mandatory Registration)

    • LLP का पंजीकरण कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय (MCA) के अंतर्गत कराया जाता है।

    • पंजीकरण के बाद इसे एक LLPIN (Limited Liability Partnership Identification Number) मिलता है।

  6. न्यूनतम पूंजी की आवश्यकता नहीं (No Minimum Capital Requirement)

    • LLP बनाने के लिए किसी निश्चित न्यूनतम पूंजी की आवश्यकता नहीं है।

  7. कराधान (Taxation)

    • LLP को साझेदारी फर्म की तरह कर देना होता है।

    • इस पर कॉर्पोरेट टैक्स नहीं लगता, जिससे कर बचत होती है।

  8. वार्षिक अनुपालन (Annual Compliance)

    • LLP को वार्षिक रिटर्न और वित्तीय विवरण MCA के पास जमा कराने होते हैं।

    • अनुपालन निजी लिमिटेड कंपनी की तुलना में सरल और सस्ता है।

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LLP Act, 2008 के उद्देश्य

  • साझेदारी और कंपनी दोनों की खूबियों को जोड़कर एक लचीला एवं सुरक्षित व्यवसायिक ढांचा उपलब्ध कराना।

  • उद्यमियों और पेशेवरों (Professionals) को एक ऐसा प्लेटफॉर्म देना जिसमें कम जोखिम के साथ व्यवसाय किया जा सके।

  • निवेशकों को आकर्षित करना और भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर में विश्वसनीयता और पारदर्शिता लाना।

सीमित दायित्व साझेदारी अधिनियम (LLP Act), 2008 की धाराएँ (Sections)

LLP Act (अधिनियम), 2008 कुल 14 अध्याय (Chapters) और लगभग 81 धाराओं (Sections) में विभाजित है। नीचे प्रमुख धाराओं का संक्षिप्त विवरण दिया गया है –

अध्याय 1 – प्रारंभिक (Preliminary) [धारा 1-2]

  • धारा 1 – अधिनियम का संक्षिप्त नाम, विस्तार और लागू होने की तिथि बताती है।

  • धारा 2 – अधिनियम में प्रयुक्त महत्वपूर्ण शब्दों की परिभाषाएँ (जैसे – LLP, नामित साझेदार, वित्तीय वर्ष आदि)।

अध्याय 2 – सीमित दायित्व साझेदारी का गठन (Incorporation) [धारा 3-10]

  • धारा 3 – LLP एक स्वतंत्र कानूनी इकाई है और इसके दायित्व साझेदारों से अलग होते हैं।

  • धारा 4 – LLP अधिनियम और अन्य कानूनों का आपसी संबंध।

  • धारा 5 – न्यूनतम दो साझेदारों की आवश्यकता।

  • धारा 6 – LLP में साझेदार बनने/रुकने के प्रावधान।

  • धारा 7-10 – नामित साझेदारों की नियुक्ति, जिम्मेदारियाँ और पंजीकरण की प्रक्रिया।

अध्याय 3 – सीमित दायित्व साझेदारी समझौता (LLP Agreement) [धारा 11-12]

  • धारा 11 – LLP के गठन के लिए आवश्यक दस्तावेज और पंजीकरण प्रक्रिया।

  • धारा 12 – पंजीकरण प्रमाणपत्र (Certificate of Incorporation) जारी करने की प्रक्रिया।

अध्याय 4 – साझेदार और उनके संबंध (Partners and Their Relations) [धारा 22-25]

  • धारा 22 – साझेदारों की आपसी जिम्मेदारियाँ।

  • धारा 23 – LLP समझौते के अंतर्गत साझेदारों के अधिकार और कर्तव्य।

  • धारा 24 – साझेदारी से त्यागपत्र और बदलाव की सूचना।

  • धारा 25 – साझेदारों की जानकारी का रख-रखाव।

अध्याय 5 – सीमित दायित्व (Extent of Liability) [धारा 26-30]

  • धारा 26 – LLP अपने कार्यों के लिए स्वयं जिम्मेदार है।

  • धारा 27 – LLP के अनुबंध और कार्यों की वैधता।

  • धारा 28 – साझेदार की सीमित जिम्मेदारी।

  • धारा 29 – गलत प्रस्तुति (Misrepresentation) की स्थिति में दायित्व।

  • धारा 30 – धोखाधड़ी (Fraud) के मामलों में असीमित दायित्व।

अध्याय 6 – योगदान (Contribution) [धारा 32-33]

  • धारा 32 – साझेदारों का पूंजी योगदान।

  • धारा 33 – योगदान की प्रकृति (नकद, संपत्ति, सेवाएँ इत्यादि)।

अध्याय 7 – वित्तीय प्रकटीकरण (Financial Disclosures) [धारा 34-40]

  • धारा 34 – खातों का रख-रखाव और वार्षिक विवरण।

  • धारा 35 – रिटर्न दाखिल करने का प्रावधान।

  • धारा 36 – साझेदारों को पुस्तकों की जाँच का अधिकार।

  • धारा 37-40 – वित्तीय रिपोर्टिंग और सरकारी निरीक्षण से संबंधित प्रावधान।

अध्याय 8 – LLP का परिवर्तन (Conversion) [धारा 55-58]

  • धारा 55 – पारंपरिक साझेदारी को LLP में बदलने का प्रावधान।

  • धारा 56 – निजी कंपनी से LLP में परिवर्तन।

  • धारा 57 – अनलिस्टेड पब्लिक कंपनी से LLP में परिवर्तन।

  • धारा 58 – परिवर्तन की प्रक्रिया और परिणाम।

अध्याय 9 – विदेशी LLP (Foreign LLP) [धारा 59]

  • धारा 59 – भारत में विदेशी LLP का पंजीकरण और संचालन से संबंधित प्रावधान।

अध्याय 10 – समझौता एवं पुनर्निर्माण (Compromise, Arrangement, Reconstruction) [धारा 60-62]

  • धारा 60 – LLP का आपसी समझौता।

  • धारा 61 – LLP के पुनर्गठन की प्रक्रिया।

  • धारा 62 – LLP का विलय (Amalgamation)।

अध्याय 11 – विघटन और समाप्ति (Winding Up & Dissolution) [धारा 63-65]

  • धारा 63 – LLP को स्वेच्छा से बंद करने की प्रक्रिया।

  • धारा 64 – न्यायालय द्वारा विघटन के कारण।

  • धारा 65 – विघटन की विधि।

अध्याय 12 – दंड और दायित्व (Penalties) [धारा 74-80]

  • LLP अधिनियम के उल्लंघन पर दंड का प्रावधान।

  • समय पर रिटर्न न भरने या नियमों का पालन न करने पर जुर्माना।

अध्याय 13 – विविध (Miscellaneous) [धारा 81]

  • LLP अधिनियम से संबंधित नियम बनाने का अधिकार केंद्र सरकार को।

सीमित दायित्व साझेदारी अधिनियम (LLP Act), 2008 में दी गई धाराएँ LLP के गठन, संचालन, वित्तीय अनुशासन, परिवर्तन और विघटन से जुड़ी सभी प्रक्रियाओं को कानूनी मान्यता देती हैं। इससे LLP न केवल उद्यमियों के लिए सुरक्षित और सरल व्यवसाय मॉडल बनता है, बल्कि निवेशकों और ग्राहकों के बीच विश्वसनीयता और पारदर्शिता भी लाता है।

LLP और पारंपरिक साझेदारी में अंतर

बिंदुपारंपरिक साझेदारीसीमित दायित्व साझेदारी (LLP)
कानूनी स्थितिअलग कानूनी इकाई नहींअलग कानूनी इकाई
दायित्वअसीमित (साझेदार व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार)सीमित (केवल निवेश तक जिम्मेदार)
पंजीकरणवैकल्पिक (राज्य स्तर पर)अनिवार्य (MCA के अंतर्गत)
साझेदारों की संख्याअधिकतम 50 तककोई अधिकतम सीमा नहीं
पूंजी आवश्यकताकोई नियम नहींन्यूनतम पूंजी की जरूरत नहीं
विश्वसनीयताअपेक्षाकृत कमअधिक (कानूनी मान्यता प्राप्त)

LLP स्थापित करने की प्रक्रिया

The process of establishing an LLP
  1. नाम आरक्षण (Name Reservation) – MCA पोर्टल पर LLP का नाम आरक्षित करना।

  2. डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) – साझेदारों के लिए DSC प्राप्त करना।

  3. डायरेक्टर आइडेंटिफिकेशन नंबर (DIN) – नामित साझेदारों के लिए DIN लेना।

  4. फॉर्म भरना और जमा करना – LLP Incorporation Form भरकर MCA पोर्टल पर जमा करना।

  5. LLPIN प्राप्त करना – पंजीकरण सफल होने पर LLP को एक अद्वितीय नंबर मिलता है।

  6. LLP समझौता (LLP Agreement) – साझेदारों के बीच अधिकारों और कर्तव्यों का उल्लेख करते हुए समझौता बनाना।

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LLP के लाभ

  • सीमित दायित्व का सुरक्षा कवच

  • लचीलापन और सरल अनुपालन

  • अलग कानूनी इकाई का दर्जा

  • निवेशकों और बैंकों से विश्वसनीयता

  • कर बचत और कम अनुपालन लागत

LLP की कमियाँ

  • बाहरी निवेशकों (जैसे वेंचर कैपिटल) के लिए यह उतना आकर्षक नहीं है, जितना निजी लिमिटेड कंपनी।

  • कुछ मामलों में, अनुपालन न करने पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।

  • शेयर जारी करने की अनुमति नहीं है, जिससे बड़ी पूंजी जुटाने में कठिनाई हो सकती है।

निष्कर्ष

सीमित दायित्व साझेदारी अधिनियम (LLP Act), 2008 ने भारत में व्यवसाय करने के तरीके को एक नया आयाम दिया। यह एक ऐसा ढांचा है जो साझेदारी की लचीलापन और कंपनी की सीमित दायित्व की सुरक्षा दोनों को एक साथ प्रदान करता है। छोटे और मध्यम उद्यम (SMEs), स्टार्टअप्स और पेशेवर फर्मों (जैसे – वकील, चार्टर्ड अकाउंटेंट, आर्किटेक्ट्स) के लिए यह एक बेहतरीन विकल्प है।

आज के समय में LLP को एक सुरक्षित, लचीला और किफायती व्यवसाय मॉडल माना जाता है, जिसने भारत के उद्यमशीलता पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने में अहम योगदान दिया है।

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LLP Act, 2008 – FAQs

LLP Act, 2008 क्या है?

LLP Act, 2008 वह कानून है जो भारत में Limited Liability Partnership (LLP) के गठन, संचालन और विघटन को नियंत्रित करता है।

यह अधिनियम वर्ष 2008 में पारित हुआ और बाद में लागू किया गया।

इस अधिनियम का उद्देश्य साझेदारी और कंपनी के लाभों को मिलाकर एक लचीला और सुरक्षित व्यवसायिक ढांचा प्रदान करना है।

LLP को एक अलग कानूनी इकाई (Separate Legal Entity) का दर्जा प्राप्त होता है।

LLP बनाने के लिए न्यूनतम 2 भागीदार आवश्यक होते हैं।

इस अधिनियम के अंतर्गत भागीदारों की देयता सीमित (Limited) होती है।

LLP Agreement भागीदारों के अधिकार, कर्तव्य और आपसी संबंधों को निर्धारित करता है और यह अधिनियम के तहत वैध होता है।

हाँ, LLP Act, 2008 के अनुसार LLP का पंजीकरण अनिवार्य है।

जब LLP का टर्नओवर या योगदान निर्धारित सीमा से अधिक हो, तब ऑडिट अनिवार्य होता है।

हाँ, अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार LLP का नाम बदला जा सकता है।

हाँ, नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माना और दंड का प्रावधान है।

यह अधिनियम स्टार्टअप्स, प्रोफेशनल फर्म्स और छोटे-मध्यम व्यवसायों के लिए उपयुक्त है।

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